नई ‌‌‌‌‌‌इबारत

शनिवार, 9 जुलाई 2011

Dabang Dunia me Prakasit Khabre

व्यंग्य : एक आंदोलन खड़ा किया जाए

जिस प्रकार देश में धरना प्रदर्शन, आंदोलन की जो चुनोतियां प्रस्तुत की जा रही हैं उन होल-हवाल बयानों से पत्र-पत्रिकाओं और टेलीविजन पर जो मुद्दा छाया हुआ उसे देख-पड़कर विभिन्न चौक चौराहों से लेकर आज घर-बाहर और चौखट के अंदर चौके तक पहुंच गया है।
कल ही रामसुख और मुरारीलाल चाय की दुकान पर चाय की चुस्कियां लेते हुए गपगपा रहे थे कि चलो अपन भी कोई राजनीतिक पार्टी के माध्यम से इस प्रकार का कोई अभियान चलाएं जिससे समाज के साथ-साथ अपना भी कल्याण हो जाए। आने वाला समय चुनाव का है। अगर थोड़ी भी पब्लिसिटी हो गई तो उस समय चांदी काट लेंगे। ऐसे रामसुख ने राममोहन का हाथ झिंझोड़ते हुए बोला।
बात तो सच है। दूर से सुन रहा सुंदरलाल बोला।
अरे सुंदर तेरे को तो बीच में टांग अटकाने में ही मजा आता है। अभी झंडा बना ही नहीं है और तुने अपना डंडा पहले ही तैयार कर लिया।
राममोहन : अमां यार ऐसा भी कुछ होता है क्या। इसके लिए पहले से ही पापड़ बेलना पड़ते हैं।
रामसुख : अरे इतने सालों से पापड़ ही तो बेल रहे हैं।
सुंदरलाल : हां ये बात तो सही है जितनी मेहनत इन फोकटियों के लिए चार पैसों के लिए करते हैं। इतनी मेहनत यदि अपन किसी अपने के लिए कर दें तो निश्चित ही कोई अपना आदमी तो बड़ा होगा ही। और अपने भी रूतबे में कुछ बड़त तो हो ही जाएगी। लो कलमकार जी इधर ही आ रहे हैं। उनसे बात कर लेते हैं।
रामसुख : अरे कलमकार भैया। आओ चाय-वाय हो जाए।
कलमकार चारों और देखते हुए पुछा क्यों भइया आज क्या तुम्हारी शादी की साल गिरह है या तुम्हारी जन्मदिन है। सालों से मैं आ-जा रहा हूं। चवन्नी की चाय से लेकर आज तक तुमने कभी अपनी जेब में हाथ नहीं डाला और जब तुम्हारी छाप चवन्नी पर बेन लग गया तो इतने खुश हो रहे हो की चाय बुलवाकर पिला रहे हों।
रामसुख : अम्मां यार अब भी चवन्नी को रो रहे हैं। बातें आज करोड़, दस करोड़, 100 करोड़ और तीन सौ करोड़ से बड़कर एक लाख करोड़ रुपए की सीमा को पार कर गए हैं। भाई लोगों के बैंकों से छापे में जो रकम उगल रही है। उनमें सड़क छाप से करोड़ पति लोग खरबपति से भी अधिक बन रहे हैं। अगर उनके यहां छापे नहीं पड़ते बातें वहीं के वहीं रहती। आज जो कार में घुम रहे हैं उनके पास न तो कल सायकल थी और न ही रहने को घर। आज वो अपने फार्म हाउस के नाम पर हजारों लोगों को बसा रहे हैं। न जाने कितने घरों को उजाड़कर मॉल बनवा रहे हैं।
इस बीच चाय वाले ने सचमुच चाय का गिलास हाथ में थमाते हुए कहा लीजिए साहब चाय पीजिए।
घुरते हुए मैं किसी और की चाय के पैसे नहीं दुगा। मैं बुदबुदाया : अगर लगे तो इस चाय के पैसे मुझसे ले लेना।
चाय वाला छन्नुलाल: अरे नहीं साहब इस चाय के पैसे नहीं लगेंगे। यह चाय आज आपके लिए मेरी तरफ से है। स्पेशल बनाई है।
मैं आश्चर्य चकित होते हुए उसकी ओर देखते हुए बोला : क्या भैया तु भी इन चिटफंडियों के साथ है क्या। तुम सब चिटफंड को कोई कारोबार तो नहीं करने जा रहे हो। और यदि ऐसा है तो चाय के पैसे मैं दे दूंगा। मुझे बदनाम नहीं होना तुम्हारे साथ आकर।
रामसुख (झुंझलाते हुए बोला) : अरे नहीं भाई साहब आप तो न जाने किन किन बातों को सोचने लगे हैं। अमां जरा हमारी भी सुन लो या अपनी ही धकियाते जाओगे।
(रामसुख को घुरते हुए कलमकार को देखा)
रामसुख : भाई साहब देश भर में जिस प्रकार आंदोलन, अनशन, महंगाई अपना रौद्र रूप दिखा रही है। उसी प्रकार अनशन प्रेमी, आंदोलन प्रेमी भी अपना रूतबा दिखा रहे हैं। भ्रष्टाचार की सूरसा दिन दूनी और रात चौगूनी बढ़ रही है। हम यहां बैठकर सिर्फ गप्पे और गप्पे मारकर रोज अखबार और टी.वी. पर यहां वहां की खबरें पढ़कर सिर्फ बातें ही करते रहते हैं कि फलां के एटीएम से इतने करोड़ रुपए निकले। दो और एटीएम मिले, दो लाकरों ने उगला सोना ऐसी हेडलाइन पड़ते हैं। यहां तक की सत्य सांई बाबा के कमरे से मिले 11 करोड़ रुपए नगद, 98 किलो सोना, 300 किलो चांदी निकली। और आप हम। चाय-नाश्ते पर अटके हैं। इस तरह तो अपनी नैया चल दी।
तुम क्या चाहते हो। इनके यहां ढाका डालना। या इनके यहां चोरी करना।
नहीं भाई साहब (रामसुख बीच में टोकते हुए बोला) : हम चाहते हैं देश में एक ऐसा आंदोलन खड़ा किया जाए जिससे अपनी भी धाक जम जाए। अपन भी रातों रात महात्मा गांधी जी रास्ते पर चलते हुए कुछ हद तक तो इस देश में एक सोसायटी को खड़ा कर दें। या अपने गुरु अन्ना हाजरे की तरह पब्लिसिटी का नया रास्ता अख्तियार कर लें। कुछ तो करें। इस तरह अखबार टी.वी. से तो अपना दिन बतियाने और रातें इन खबरों का विश्लेषण देखने में ही बीता जा रहा है। क्यों न कुछ किया जाए। कलमकारजी की ओर मुखातिब होते हुए आप बताइए क्या किया जाए।
कलमकार : मैं क्या बताऊं? जब सब कुछ आपने तय कर लिया है तो आप लोग करें। मुझे तो अपनी कलम घसीटने से मतलब है।
छन्नुलाल (बीच में बोलते हुए) साहब एक आप ही तो हम लोगों को रास्ता बताने वाले। आप जो कहेंगे वही होगा। हम सब यही चाहते हैं कि आप ही कोई रास्ता बताएं जिससे देश दुनिया के लिए कुछ किया जा सके।
क्या बोला? (कलमकार मुस्कुराते हुए): देश और दुनिया के लिए कुछ करना चाहते हो।
रामसुख बोला : हां। यदि हम भ्रष्ट तरीके से देश के बाहर जमा धन यदि देश में ले आएं तो हमारा कुछ कल्याण हो जाएगा। देशवासी जो 460 से 600 रुपए का एक सिलेंडर खरीद रहे हैं। वह कम से कम दो सौ ढाई सो का हो जाए। हमारे यहां के राजे-रजवाड़ों का जो धन लोगों ने काली कमाई के रूप में देश के बाहर सिफ्ट किया हुआ है और यहां पर राजा भोज की तरह आलीशान जीवन जी रहे हैं और अपनी आने वाली संतानों के कल्याण के लिए जमा कर रखा है और नित नए तरीके से उसको बड़ाते जा रहे हैं। कभी खेल में तो कभी रेल में। उनको ठोर ठिकाना मिल सके। खादी के खद्दर में मखमल का पैंबंद लगाए बैठे हैं।
कलमकार : मुक दर्शक की भाती उनका चेहरा पढ़ते हैं।
मुरारीलाल : भइये कुछ तो करो इस देश के लिए आज फैसला करो कुछ न कुछ तो करना ही है। नहीं तो अन्ना भैया या बहनाजी मेरा मतलब है बाबाजी के साथ ही हो जाएं। आप बताइए।
कलमकार (बहुत देर सोचने के बाद) : तुम लोग एक काम करो मुक्त भ्रष्टाचार के लिए आंदोलन करो। देश की तरक्की के लिए आंदोलन। सुप्त पड़े स्वदेशी आंदोलन के लिए आंदोलन करो। कुछ करने के लिए कुछ करो। पर मुझे मुक्त करो।
इसी सोच के लिए कलमकार ने अपनी राह पकड़ ली। पर मनमस्तिष्क में यही ज्वर रह रह कर आ रहा था। एक आंदोलन करो। आंदोलन करो। अनशन करो।


शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

बापू का चश्मा गायब


बात कुछ यूं है कि मैं अपने साथियों के साथ ऑफिस में बैठा था, काम अपनी प्रारंभिक रफ्तार में ही था। एक ओर से हमारे साथी ने आफिस के कमरे में प्रवेश किया। उससे पूछा कहां थे भाई साहब।
वहीं अलसाई हालत में जवाब दिया ऊपर गया था।
वह अपना वाक्य पूरा करता की हमारे सीनियर महोदय ने तपाक से कहा कि अब यदि ऊपर जाओ तो बापू से यहमत कह देना की उनका चश्मा चोरी हो गया।
ऑफिस में धीमी किंतु आश्चर्य भरी मुस्कुराहट फैल गई।
क्योंकि आज के दैनिक अखबार में यह खबर प्रकाशित हुई है कि बापू का वर्धा आश्रम से चश्मा चोरी हो गया है।
अब जाऊंगा तो बता दूंगा।
अबे बताने का मना किया है। वरना वहां फिर से अनशन शुरू हो जाएगा। और सारे भ्रष्टि पुलिसियों की शामत आ जाएगी। फिर कहने को सरकार अपना रूतबा पेश करेगी। मान-मनौव्वल होगी। और रातों-रात उनको भी कभी सिले हुए कपड़े (निश्चित ही महिला के) पहनकर भागने की कोशिश करना पड़ेगी। हर कोई अन्ना नहीं हो सकता है जो मान-मनौव्वल के बाद अपना अनशन समाप्त करें। वह जमाना शायद अब चुनिंदा आश्वासनों की भेंट चढ़ गया है। भ्रष्ट तंत्र है भ्रष्टाचार से ही जाएगा।
बात गांधीजी के चश्मे कि है। इस पर संजय दत्त को लेकर कोई न कोई फिल्म तो जरूर बनाने की ठानेगा। अब भाई गांधीजी का चश्मा है कुछ और नहीं। गांधीजी अब अखबार तो पड़ते नहीं होंगे। क्योंकि चश्मा तो यहीं था। भला हो भारतीय भ्रष्टायोग का जिन्होंने ऊपर वालों के यहां कम्प्यूटर-इंटरनेट, टी.वी. सुविधा नहीं दी। जिससे तात्कालिक समाचार या अन्य समाचारों से वे वंचित हैं। बार-बार इस आशय के समाचार विभिन्न समाचार चैनलों पर भी प्रसारित होते रहे हैं। पिछली बार जब सबसे गतिमान चैनल के सबसे सुपर संवाददाता ने जो लाइव टेलिकास्ट वहां से प्रसारित किया था उसमें भी इस आशय का विस्तृत वर्णन था। तब भी भ्रष्टायोग के कई शूरविरों ने खुलकर अपनी बात तो रखी थी पर अपने मातहतों के ढीले रवैये को ढाल के रूप में आगे कर अपनी ढीली पतलून को कस के सामने खड़े हो गए थे।
रही बात चश्मे की तो चश्मा बापू का था। वह सेवाग्राम वर्धा के आश्रम में था? वह तो बापू के साथ ही होना चाहिए था। वहां के किसी कर्मचारी को इस बारे में जानकारी नहीं है। अगर होगी तो वह सफाई कर्मी (निश्चित ही असिक्षित जिसे बापू के चश्मे की कीमत का अंदाजा नहीं होगा) जो रोज वहां सफाई करता था। आश्रम के कर्ताधर्ता ने गत दिनों बताया कि चश्मे की खबर किसी कर्मचारी ने बाहर नहीं की तो फिर यह खबर बाहर कैसे निकल गई। आगे की कार्रवाई की सारी जानकारी जुटाई जाएगी। उस सख्स का पहले पता लगाया जाएगा जिसने यह खबर बाहर (मीडिया तक) फैलाई है। यदि आपको इस बारे में जानकारी हो तो कृपया आप बता दीजिए इस पर हम इनाम भी रखेंगे। आपका नाम गुप्त रखा जाएगा। हम भ्रष्टाचार को पूरी तरह से खत्म कर देने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। इसके हम पुलिस कार्रवाई पर भी विचार कर रहे हैं।
यदि मान लिया जाए कि गांधीजी यदि थाने में रिपोर्ट करने के लिए थाने जाएंगे क्या रिपोर्ट लिखी जाएगी। वह अपनी सहायिकाओं की मदद से यदि थाने पहुंच भी गए तो थानेदार अपनी मुछों पर ताव देते हुए उन्हें एक कुर्सी (थाने में रखी बेंच) पर बैठा देंगे और उनकी सहायिकाओं की इस कदर खातिरदारी करेंगे की उनकी सारी रिपोर्ट एक किताब बन जाएगी। उत्तर प्रदेश के लखीपुर खिरी पुलिस थाना की तरह न जाने क्या-क्या हरकतें होती और गांधीजी रिपोर्ट की इबारतें लिखी जा रही हैं बाबा के शब्द सुन-सुन कर बोराते रहते। रही बात चश्मे की तो चश्मा वहां था या नहीं यही विचार चल रहा हा। आगे की मिलने पर विस्तार से मिल बैठकर भ्रष्टाएंगे।

रविवार, 15 मई 2011

भारत का सम्पूर्ण इतिहास पढ़ने के बात यह जानने को मिलता है कि इससे भारतीय संस्कीडत को करतचकरकत रकतचरकत रकत ्िो् िो्िर्कि्

बुधवार, 9 मार्च 2011

विद्या बालन की तस्वीर से छेड़छाड़











हाल ही में खबर पड़ी बिकनी गर्ल विद्या बालन की तस्वीर से छेड़छाड़ कर किसी मैग्जिन ने कवर पेज पर छाप दी। मामला बड़ा खतरनाक है। विद्या बालन जिसने कई तरह की बिकनी पहनकर अपना फोटो सेशन तो करवाया ही है। ऐसे में यदि किसी पत्रिका में फोटो छप गया है तो निश्चित ही एक घोर अपमान की श्रेणी में आता है। लेकिन क्या उन लड़कियों के बारे में सोचा जाएगा जिन लड़कियों को अवारा लफंगों से लेकर उच्च धनाड्य लोग मात्र अपने मनोरंजन के लिए छेड़छाड़ करते हैं। यह तो मात्र तस्वीर का बखेड़ा। बहस तो उन पर होना चाहिए जो पैसों की ताकत से कुछ भी कर गुजरते हैं और उनका बाल भी बांका नहीं होता है।











सोमवार, 27 सितंबर 2010

28 सितम्बर यानि एक नए युग की शुरूआत


वैसे तो हर वर्ष 28 सितम्बर आती है और हर माह दिनांक 28 भी आती ही हैं। जैसे 24 सितम्बर निकल गई वैसे ही 28 सितम्बर भी निकल जाएगी। कुछ अहम् है इस बार की 28 सितम्बर जो भारत के इतिहास में या तो मिल का पत्थर बन सकती है या फिर एक बार फिर 24 सितम्बर की तरह बिते हुए कल की तरह गुजर जाएगी।


28 सितम्बर को वैसे तो सुप्रीम कोर्ट का एक अहम किरदार निभाया जा रहा है जो न्यायालय से हटकर होगा। अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वो हुआ ही है। इस बार वह होने जा रहा है जो अब तक किसी न्यायालय ने नहीं किया। इस बार देश की बहुत बड़ी आबादी का नेतृत्व कर रहे लोगों को बीच सामंजस्य बैठाने का। क्या इसमें सुप्रीम कोर्ट सफल हो पाएगा। यह एक विचारणीय प्रश्न हो सकता है। लेकिन जस्टिस एच।एस. कापडिय़ा की अध्यक्षता वाली बेच इस मुद्दे पर मंगलवार को सुनवाई करेगी।


मुद्दा वैसे तो बहुत ही अहम है जिससे भारत देश की अस्मिता जुड़ी है तो एक तरफ एक लुटेरे बाबर जिसने बर्बरतापूर्वक भारत देश पर राज किया है की यादें। एक तरफ मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं तो एक तरफ विदेशी अक्रांता बाबर है। भगवान राम के साथ हर भारतीय की आस्था जुड़ी है। उसे भले ही लोग धार्मिक धर्मांधता कहें या कुछ और, वह जुड़ाव तो है। क्योंकि उस स्थान का नाम अयोध्या है। वहां बहने वाली नदी का नाम सरयू है । वहां पर विभिन्न मठ, मंदिर स्थापित हैं। वह देवों की भूमि कहलाती है। उस स्थान से आज से नहीं सैकड़ों वर्षों से विवाद होता रहा है। यदि उस स्थान का हल निकल सकता है तो वह सिर्फ सामंजस्य से दूरस्थ सोच से वरना कोई हल ही नहीं है।


वर्तमान में जो दृश्य सामने आ रहा है वह परदे के पीछे की सुगबुगाहट के अलावा कुछ नहीं है। सभी दर्शकों की भांति बाहर हो हल्ला कर रहे हैं। किन्तु परंतु के सभी कयास पिटारी में बंद हो चुके हैं। होना क्या है? क्या होगा? मैं ही उलझी हुई है देश की बिरादरी। एक ओर तो आतंकवाद, दूसरी और माओवाद-नक्सलवाद की विभिषिका झेल रहा भारत एक नए माइल पर पहुंचने को आतुर है। उसमें सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद क्या स्थिति उत्पन्न होती है विचारणीय है। विचार करना भी होगा।


आजादी के बाद या यूं कहें की आजादी के पहले से ही बहुत विकराल दंश झेल चुके भारत देश को किन हालातों में दो-दो विभाजन (पाकिस्तान, बांगलादेश) के रूप में झेल चुका हैं। अब फिर से कश्मीर की स्वयत्तता की मांग पूरजोर पकड़ रही है। आजादी के 60 सालों के बाद भी स्थिति वही के वही है। आजादी के बाद यदि पाकिस्तान के बंटवारे के बाद ही समान कानून व्यवस्था को बनाए रखा होता तो आज यह स्थिति नहीं होती। सरदार वल्लभभाई पटेल की मानी होती तो यह विषम स्थिति नहीं होती। जैसा उनका कथन था गुलामी के सभी प्रतिकों को नष्ट कर दिया जाए। परन्तु गुलामी के सारे प्रतिक आज अजर अमर हो गए हैं। विभिन्न स्थानों पर स्थापित मजार आज आलीशान महल के रूप में खड़े हो चुके हैं। चर्च के साथ-साथ विद्यालय भी बन चुके हैं। वर्तमान में जो हालात हैं वह सभी उन्हीं विचारों पर आकर टिक गई है की अगर पाकिस्तान का बटवारा हुआ था या बांग्लादेश का विभाजन हो गया था फिर हिन्दुस्तान आजाद क्यों नहीं हुआ। हिन्दुस्तानियों में जो मातृभाव है वह इस भूमि पर रहने वाले अन्य लोगों में क्यों नहीं आया। कहां चुक हुई है। अगर मुसलमान को 4 पत्नियों से 16 बच्चे पैदा करने की स्वायत्तता बंद नहीं हुई तो आगे ना जाने कितने विखंडन का दंश झेलना होगा। एक समान कानूनी प्रक्रिया नहीं हूई तो और भी बड़ा दंश देश के सामने होगा। इस बार की जनसंख्या की गणना में जो विस्फोट होने वाला है उसके रिजल्ट ऐसे चौकाने वाले होंगे जिससे आगामी अर्थव्यवस्था को भारी धक्का लग सकता है। कई राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक हो जाएगा। कई राज्यों में तो वह तीसरे क्रम पर पहुंच जाएगा। ऐसे में अल्पसंख्यक आयोग किसके लिए काम करेगा। अल्पसंख्यक आयोग को तुरंत समाप्त कर देना चाहिए।


काश्मीर की वर्तमान स्थिति का आंकलन करें तो हम पाएंगे की आजादी के बाद जब श्यामाप्रसाद मुकर्जी शांति और अमन का पैगाम लेकर गए थे, उस शांति के अग्रदूत की हत्या के बाद से ही वहां की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। आज की परिस्थितियों में वहां की जनसंख्या सिर्फ तो सिर्फ मुसलमान ही बची हुई है। जो लोग बचे हुए वह न तो अपना धर्म निभा रहे हैं न ही खुलकर किसी बात का विरोध जता पा रहे हैं। वर्ष 1989-90 से कश्मीरी पंडितों को चुन-चुनकर मारा गया और उन्हें वहां से निकाला गया। वे अपने ही देश में शरणार्थियों की भांति रह रहे हैं। वर्तमान में इक्का-दुक्का कुनबे ही वहां सिर्फ और सिर्फ सेना के साए में ही अपने को जीवित रखे हैं। और वहां जनजीवन असामान्य है। वरना पड़ौसी देशों से न जाने क्या-क्या हरकते होती और आम जनता की भीड़ का सहारा लेकर न जाने क्या क्या अंजाम दिए जाते।


केन्द्र सरकार द्वारा जो सर्वलीय दल भेजकर चर्चा करवाई गई उसके नतीजे चाहें जो निकले पर यह बात तो स्पष्टत: निकल कर आ रही है कि वे जिन लोगों से मिलकर आए हैं वे सभी उमर अब्दुल्ला के शासन से उकता से गए हैं। सिर्फ पत्थरबाजी करना या शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाना उनकी मंशा नहीं है। उनकी मंशा कुछ और दिखाना है। आम जनता के मन में एक-दूसरे के प्रति कुशंका का भाव पैदा करना है।


इन कुचेस्टाओं का कोई अंत होगा तो वह है विचारों से विचारों के अमल से। हमें क्या फिर से सन् 1946-47 का दंश झेलना है या फिर सन् 1951 की भांति अपना संविधान घोषित करना है। मैं यह नहीं कहता कि संविधान निर्माताओं ने कोई कमी कर दी है जिसका प्रतिफल आज 28 तारीख को देखने को मिल रहा है। मैं यह कोशिश कर रहा की जो वर्तमान स्थिति एक अहम मुद्दे को लेकर है, उसके साथ ही देश में व्याप्त कई और जटिल समस्याएं हैं जो मुंह बाएं, घर के आसपास, मुहल्ले में भी देखने को मिल जाएगी। एक समाज दो बच्चे का पालन करे वह भी अल्प व्यवस्थाओं के साथ। एक समाज चार पत्नियां रखे अल्पसंख्यक सुरक्षा के साथ। क्या इससे जो समाज बनेगा कल क्या उस समाज के अंग आप और हम रह पाएंगे।


28 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट जो सामंजस्य स्थापित करेगा उससे यदि एक अंश मात्र भी रास्ता निकलता है तो निश्चित ही भारत देश के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। न्याय से बड़ा है न्यायतंत्र और उससे भी बड़ा है भातृप्रेम। यदि इस समस्या को भातृप्रेम के दृश्य से देखा जाए तो निश्चित ही राष्ट्रप्रेम उमड़ेगा। राष्ट्र प्रेम उमड़ेगा तो एक राष्ट्रीय समस्या का अंत होगा। राष्ट्रीय समस्या का अंत हुआ तो राष्ट्र के सामने कोई दुश्मन तो क्या कोई तीसरा देश भी आंख उठाकर नहीं देख सकता।


रमेशचंद्र जोशी


भोपाल


शनिवार, 12 जून 2010