जैसा की पद्म पुराण में नर्मदा को गंगा आदि पवित्र नदियों से श्रेष्ठ बताते हुए कहा गया है - पुण्या कनखले गंगा, कुरुक्षेत्रे सरस्वती, ग्रामे वा यदि वारण्ये, पुण्या सर्वत्र नर्मदा।। अर्थात् गंगा को कनखल नामक तीर्थ में विशेष पुण्यदायी माना जाता है और सरस्वती को कुरुक्षेत्र में, किन्तु नर्मदा चाहे कोई ग्राम हो या फिर जंगल सर्वत्र ही विशेष पुण्य देने वाली है। ऐसी मां नर्मदा नदी जब भीषण गर्मी में अपनी अविरल धारा से जबकि देश और प्रदेश की कई नदियां सूख चुकी हैं ऐशे मौसम में प्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा का अविरल प्रवाह आंखो को तृप्ति और मन को शांति प्रदान करता है। जब भीषण गर्मी के इस दौरे में नर्मदा के प्रवाह के विभिन्न स्थानों पर मां नर्मदा के चित्रों को एकत्रित किया गया तो बरबस ही मन में मची वह भ्रांतियां दूर हो गई कि कहीं गर्मी की तपिश और लोगों द्वारा उठाई जा रही विभिन्न किवंदतिया की अपने दायित्व निर्वाह में कोई कमी तो नहीं हो रही है, तब 14 मई को विभिन्न स्थानों पर एक साथ लिये गये कुछ फोटो राज एक्सप्रेस ने अपने पाठकों के लिए संग्रहित किये, वे फोटो इसके साक्षी हैं कि नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवनरेखा के दायित्व का निर्वाह अबाध रूप से कर रही है।
नर्मदा नदी पर बने रानी अवंती बाई लोधी सागर, इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर जैसे बड़े बांधो में इस भीषण गर्मी के समय के लिये संग्रहित जल ही नर्मदा के इस अविरल प्रवाह का मुख्य स्त्रोत हैं। नर्मदा जल संकट के समय में भी सिंचाई और पेयजल का विश्वसनीय आधार बनी हुई है। इसके साथ ही नर्मदा अपने आस-पास बसे ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं और असंख्य वन्य प्राणियों के जीवन को सुरक्षा प्रदान कर रही है। जल संकट के समय नर्मदा का यह अविरल प्रवाह बड़े बांधो की आवश्यकता का स्वयं सिद्ध प्रमाण है।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश के अनूपपूर जिले में मेकल पर्वतमाला में बसा अमरकण्टक नर्मदा का उद्गम है। यहां से निकलकर गुजरात राज्य में खम्बात की खाड़ी से अरब सागर में समाहित होने तक नर्मदा 1312 कि.मी. में प्रवाहित होती है। अपने उद्गम के बाद नर्मदा प्रदेश के अनूपपूर, डिण्डोरी, मण्डला, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, हरदा, खण्डवा, खरगोन और बड़वानी जिलों से बहती हुई मध्यप्रदेश में कुल 1077 कि.मी. की दूरी तय करती है। नर्मदा का कुल कछार क्षेत्र 98 हजार 796 वर्ग कि.मी. है। इस कछार का 85 हजार 859 वर्ग कि.मी. क्षेत्र मध्यप्रदेश में है जो कुल कछार क्षेत्र का 87 प्रतिशत है। नर्मदा की सैकडों सहायक नदियां हैं लेकिन जिन सहायक नदियों का जलग्रहण क्षेत्र 500 वर्ग कि.मी. से अधिक है ऐसी 39 सहायक नदियां नर्मदा में मध्यप्रदेश की सीमा के अन्दर मिलती है और लोगों की जीवनदायिनी का दायित्व बखूबी निभा रही है।
नर्मदा नदी का पानी देखने भर से कर देता है पवित्र
प्रचलित मान्यता यह है कि यमुना का पानी सात दिनों में, गंगा का पानी छूने से, पर नर्मदा का पानी तो देखने भर से पवित्र कर देता है। साथ ही जितने मंदिर व तीर्थ स्थान नर्मदा किनारे हैं उतने भारत में किसी दूसरी नदी के किनारे नहीं है। लोगों का मानना है कि नर्मदा की करीब ढाई हजार किलोमीटर की समूची परिक्रमा करने से चारों धाम की तीर्थयात्रा का फल मिल जाता है। नर्मदा नदी की परिक्रमा लोगों की परंपराओं और धार्मिक विश्वासों में रची-बसी हुई है।
शासन ने चलाई विभिन्न योजनाएं
शासन-प्रशासन ने चलाई विभिन्न योजनाएं
1. पौधारोपण के माध्यम से भूमि के कटाव रोकने का प्रयास।
2. पौधारोपण के माध्यम से उर्वरा शक्ति बढ़ाने की कोशिश।
3. नदी के किनारे बसे ग्रामों को निस्तारी बांस व जलाऊ लकड़ी उपलब्ध हो।
4. पशु चारे की आपूर्ति व नदी के तटीय क्षेत्रों का सौन्दर्यीकरण।
5. भू-क्षरण में कमी व बांध से मिलने वाले लाभ में वृद्धि।
6. वन विभाग द्वारा इस योजना का क्रियान्वयन जनसहयोग व वन समिति के माध्यम से किया जाना है।
जीवित व्यक्ति के रूप में नर्मदा नदी को मिला अधिकार
प्रदेश के लिए जीवनदायिनी मां नर्मदा को प्रदेश सरकार ने गंगा नदी की तरह जीवित व्यक्ति के रूप में सभी अधिकार देने का दर्जा दिया गया है। प्रधानमंत्री की मौजूदगी में नर्मदा सेवा यात्रा के समय यह दर्जा प्राप्त करने वाली प्रदेश की पहली और देश की दूसरी नदी को जीवित व्यक्ति के अधिकार प्रदान किये गये हैं।
नई इबारत
मंगलवार, 29 मई 2018
भीषण गर्मी में आंखों को तृप्ति, मन को शांति और प्रदेशवासियों को जीवन अमृत जल दे रही मां नर्मदा
रमेश चंद्र जोशी
जैसा की पद्म पुराण में नर्मदा को गंगा आदि पवित्र नदियों से श्रेष्ठ बताते हुए कहा गया है - पुण्या कनखले गंगा, कुरुक्षेत्रे सरस्वती, ग्रामे वा यदि वारण्ये, पुण्या सर्वत्र नर्मदा।। अर्थात् गंगा को कनखल नामक तीर्थ में विशेष पुण्यदायी माना जाता है और सरस्वती को कुरुक्षेत्र में, किन्तु नर्मदा चाहे कोई ग्राम हो या फिर जंगल सर्वत्र ही विशेष पुण्य देने वाली है। ऐसी मां नर्मदा नदी जब भीषण गर्मी में अपनी अविरल धारा से जबकि देश और प्रदेश की कई नदियां सूख चुकी हैं ऐशे मौसम में प्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा का अविरल प्रवाह आंखो को तृप्ति और मन को शांति प्रदान करता है। जब भीषण गर्मी के इस दौरे में नर्मदा के प्रवाह के विभिन्न स्थानों पर मां नर्मदा के चित्रों को एकत्रित किया गया तो बरबस ही मन में मची वह भ्रांतियां दूर हो गई कि कहीं गर्मी की तपिश और लोगों द्वारा उठाई जा रही विभिन्न किवंदतिया की अपने दायित्व निर्वाह में कोई कमी तो नहीं हो रही है, तब 14 मई को विभिन्न स्थानों पर एक साथ लिये गये कुछ फोटो राज एक्सप्रेस ने अपने पाठकों के लिए संग्रहित किये, वे फोटो इसके साक्षी हैं कि नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवनरेखा के दायित्व का निर्वाह अबाध रूप से कर रही है।
नर्मदा नदी पर बने रानी अवंती बाई लोधी सागर, इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर जैसे बड़े बांधो में इस भीषण गर्मी के समय के लिये संग्रहित जल ही नर्मदा के इस अविरल प्रवाह का मुख्य स्त्रोत हैं। नर्मदा जल संकट के समय में भी सिंचाई और पेयजल का विश्वसनीय आधार बनी हुई है। इसके साथ ही नर्मदा अपने आस-पास बसे ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं और असंख्य वन्य प्राणियों के जीवन को सुरक्षा प्रदान कर रही है। जल संकट के समय नर्मदा का यह अविरल प्रवाह बड़े बांधो की आवश्यकता का स्वयं सिद्ध प्रमाण है।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश के अनूपपूर जिले में मेकल पर्वतमाला में बसा अमरकण्टक नर्मदा का उद्गम है। यहां से निकलकर गुजरात राज्य में खम्बात की खाड़ी से अरब सागर में समाहित होने तक नर्मदा 1312 कि.मी. में प्रवाहित होती है। अपने उद्गम के बाद नर्मदा प्रदेश के अनूपपूर, डिण्डोरी, मण्डला, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, हरदा, खण्डवा, खरगोन और बड़वानी जिलों से बहती हुई मध्यप्रदेश में कुल 1077 कि.मी. की दूरी तय करती है। नर्मदा का कुल कछार क्षेत्र 98 हजार 796 वर्ग कि.मी. है। इस कछार का 85 हजार 859 वर्ग कि.मी. क्षेत्र मध्यप्रदेश में है जो कुल कछार क्षेत्र का 87 प्रतिशत है। नर्मदा की सैकडों सहायक नदियां हैं लेकिन जिन सहायक नदियों का जलग्रहण क्षेत्र 500 वर्ग कि.मी. से अधिक है ऐसी 39 सहायक नदियां नर्मदा में मध्यप्रदेश की सीमा के अन्दर मिलती है और लोगों की जीवनदायिनी का दायित्व बखूबी निभा रही है।
नर्मदा नदी का पानी देखने भर से कर देता है पवित्र
प्रचलित मान्यता यह है कि यमुना का पानी सात दिनों में, गंगा का पानी छूने से, पर नर्मदा का पानी तो देखने भर से पवित्र कर देता है। साथ ही जितने मंदिर व तीर्थ स्थान नर्मदा किनारे हैं उतने भारत में किसी दूसरी नदी के किनारे नहीं है। लोगों का मानना है कि नर्मदा की करीब ढाई हजार किलोमीटर की समूची परिक्रमा करने से चारों धाम की तीर्थयात्रा का फल मिल जाता है। नर्मदा नदी की परिक्रमा लोगों की परंपराओं और धार्मिक विश्वासों में रची-बसी हुई है।
शासन ने चलाई विभिन्न योजनाएं
शासन-प्रशासन ने चलाई विभिन्न योजनाएं
1. पौधारोपण के माध्यम से भूमि के कटाव रोकने का प्रयास।
2. पौधारोपण के माध्यम से उर्वरा शक्ति बढ़ाने की कोशिश।
3. नदी के किनारे बसे ग्रामों को निस्तारी बांस व जलाऊ लकड़ी उपलब्ध हो।
4. पशु चारे की आपूर्ति व नदी के तटीय क्षेत्रों का सौन्दर्यीकरण।
5. भू-क्षरण में कमी व बांध से मिलने वाले लाभ में वृद्धि।
6. वन विभाग द्वारा इस योजना का क्रियान्वयन जनसहयोग व वन समिति के माध्यम से किया जाना है।
जीवित व्यक्ति के रूप में नर्मदा नदी को मिला अधिकार
प्रदेश के लिए जीवनदायिनी मां नर्मदा को प्रदेश सरकार ने गंगा नदी की तरह जीवित व्यक्ति के रूप में सभी अधिकार देने का दर्जा दिया गया है। प्रधानमंत्री की मौजूदगी में नर्मदा सेवा यात्रा के समय यह दर्जा प्राप्त करने वाली प्रदेश की पहली और देश की दूसरी नदी को जीवित व्यक्ति के अधिकार प्रदान किये गये हैं।
जैसा की पद्म पुराण में नर्मदा को गंगा आदि पवित्र नदियों से श्रेष्ठ बताते हुए कहा गया है - पुण्या कनखले गंगा, कुरुक्षेत्रे सरस्वती, ग्रामे वा यदि वारण्ये, पुण्या सर्वत्र नर्मदा।। अर्थात् गंगा को कनखल नामक तीर्थ में विशेष पुण्यदायी माना जाता है और सरस्वती को कुरुक्षेत्र में, किन्तु नर्मदा चाहे कोई ग्राम हो या फिर जंगल सर्वत्र ही विशेष पुण्य देने वाली है। ऐसी मां नर्मदा नदी जब भीषण गर्मी में अपनी अविरल धारा से जबकि देश और प्रदेश की कई नदियां सूख चुकी हैं ऐशे मौसम में प्रदेश की जीवनरेखा नर्मदा का अविरल प्रवाह आंखो को तृप्ति और मन को शांति प्रदान करता है। जब भीषण गर्मी के इस दौरे में नर्मदा के प्रवाह के विभिन्न स्थानों पर मां नर्मदा के चित्रों को एकत्रित किया गया तो बरबस ही मन में मची वह भ्रांतियां दूर हो गई कि कहीं गर्मी की तपिश और लोगों द्वारा उठाई जा रही विभिन्न किवंदतिया की अपने दायित्व निर्वाह में कोई कमी तो नहीं हो रही है, तब 14 मई को विभिन्न स्थानों पर एक साथ लिये गये कुछ फोटो राज एक्सप्रेस ने अपने पाठकों के लिए संग्रहित किये, वे फोटो इसके साक्षी हैं कि नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवनरेखा के दायित्व का निर्वाह अबाध रूप से कर रही है।
नर्मदा नदी पर बने रानी अवंती बाई लोधी सागर, इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर जैसे बड़े बांधो में इस भीषण गर्मी के समय के लिये संग्रहित जल ही नर्मदा के इस अविरल प्रवाह का मुख्य स्त्रोत हैं। नर्मदा जल संकट के समय में भी सिंचाई और पेयजल का विश्वसनीय आधार बनी हुई है। इसके साथ ही नर्मदा अपने आस-पास बसे ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं और असंख्य वन्य प्राणियों के जीवन को सुरक्षा प्रदान कर रही है। जल संकट के समय नर्मदा का यह अविरल प्रवाह बड़े बांधो की आवश्यकता का स्वयं सिद्ध प्रमाण है।
उल्लेखनीय है कि प्रदेश के अनूपपूर जिले में मेकल पर्वतमाला में बसा अमरकण्टक नर्मदा का उद्गम है। यहां से निकलकर गुजरात राज्य में खम्बात की खाड़ी से अरब सागर में समाहित होने तक नर्मदा 1312 कि.मी. में प्रवाहित होती है। अपने उद्गम के बाद नर्मदा प्रदेश के अनूपपूर, डिण्डोरी, मण्डला, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, हरदा, खण्डवा, खरगोन और बड़वानी जिलों से बहती हुई मध्यप्रदेश में कुल 1077 कि.मी. की दूरी तय करती है। नर्मदा का कुल कछार क्षेत्र 98 हजार 796 वर्ग कि.मी. है। इस कछार का 85 हजार 859 वर्ग कि.मी. क्षेत्र मध्यप्रदेश में है जो कुल कछार क्षेत्र का 87 प्रतिशत है। नर्मदा की सैकडों सहायक नदियां हैं लेकिन जिन सहायक नदियों का जलग्रहण क्षेत्र 500 वर्ग कि.मी. से अधिक है ऐसी 39 सहायक नदियां नर्मदा में मध्यप्रदेश की सीमा के अन्दर मिलती है और लोगों की जीवनदायिनी का दायित्व बखूबी निभा रही है।
नर्मदा नदी का पानी देखने भर से कर देता है पवित्र
प्रचलित मान्यता यह है कि यमुना का पानी सात दिनों में, गंगा का पानी छूने से, पर नर्मदा का पानी तो देखने भर से पवित्र कर देता है। साथ ही जितने मंदिर व तीर्थ स्थान नर्मदा किनारे हैं उतने भारत में किसी दूसरी नदी के किनारे नहीं है। लोगों का मानना है कि नर्मदा की करीब ढाई हजार किलोमीटर की समूची परिक्रमा करने से चारों धाम की तीर्थयात्रा का फल मिल जाता है। नर्मदा नदी की परिक्रमा लोगों की परंपराओं और धार्मिक विश्वासों में रची-बसी हुई है।
शासन ने चलाई विभिन्न योजनाएं
शासन-प्रशासन ने चलाई विभिन्न योजनाएं
1. पौधारोपण के माध्यम से भूमि के कटाव रोकने का प्रयास।
2. पौधारोपण के माध्यम से उर्वरा शक्ति बढ़ाने की कोशिश।
3. नदी के किनारे बसे ग्रामों को निस्तारी बांस व जलाऊ लकड़ी उपलब्ध हो।
4. पशु चारे की आपूर्ति व नदी के तटीय क्षेत्रों का सौन्दर्यीकरण।
5. भू-क्षरण में कमी व बांध से मिलने वाले लाभ में वृद्धि।
6. वन विभाग द्वारा इस योजना का क्रियान्वयन जनसहयोग व वन समिति के माध्यम से किया जाना है।
जीवित व्यक्ति के रूप में नर्मदा नदी को मिला अधिकार
प्रदेश के लिए जीवनदायिनी मां नर्मदा को प्रदेश सरकार ने गंगा नदी की तरह जीवित व्यक्ति के रूप में सभी अधिकार देने का दर्जा दिया गया है। प्रधानमंत्री की मौजूदगी में नर्मदा सेवा यात्रा के समय यह दर्जा प्राप्त करने वाली प्रदेश की पहली और देश की दूसरी नदी को जीवित व्यक्ति के अधिकार प्रदान किये गये हैं।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें